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<div style="text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;"><font color=#003333 size=5>यूँ तो कुछ भी नया नहीं<small> -आदित्य चौधरी</small></font></div>
 
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यूँ तो कुछ भी नया नहीं मेरे फ़साने में !
 
यूँ तो कुछ भी नया नहीं मेरे फ़साने में !
 
लुत्फ़ आता है, तुझे बारहा सुनाने में !!
 
लुत्फ़ आता है, तुझे बारहा सुनाने में !!
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एक लम्हा ही जीऊँ, जब हो मौत आने में !!
 
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15:50, 5 अगस्त 2017 के समय का अवतरण

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यूँ तो कुछ भी नया नहीं -आदित्य चौधरी

यूँ तो कुछ भी नया नहीं मेरे फ़साने में !
लुत्फ़ आता है, तुझे बारहा सुनाने में !!

वो जो इक दूर से आवाज़ आ रही थी कोई !
उसे तो वक़्त है, मेरे क़रीब आने में !!

तुझे भुला न सकूँगा ये मेरी फ़ितरत है !
चैन मिलता है मुझे, ख़ुद को भूल जाने में !!

सुन के आवाज़ अपने दिल के टूट जाने की !
मैं भी हैरान हूँ इस, क़िस्म के वीराने में !!
 
ग़मे दौराँ की भी क़ीमत लगाई जाती है !
तन्हा जीने की भी इक, शर्त है ज़माने में !!
 
कोई मक़्सद ही नहीं मुझको मिला जीने का !
एक लम्हा ही जीऊँ, जब हो मौत आने में !!



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